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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत - लोकतंत्र, समावेश और सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषणआमरे मूसा, पूर्व महासचिव, अरब लीग
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रतिष्ठित अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी,
भारत के प्रतिष्ठित पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह,
माननीय पूर्व राष्ट्रपतिगण,
महिमामयी महारानीजी,

देवियो और सज्जनो,

मेरे लिए यह सम्मान का विषय है कि मैं आज यहाँ भारत में आप लोगों के साथ एक महान व्यक्तित्व, एक महान राजनयिक और नेता को स्मरण करने के लिए उपस्थित हूँ। हम एक ऐसे विरले महापुरुष की विरासत को याद कर रहे हैं जो अपनी दृष्टि, साहस, समर्पण भाव और कड़े परिश्रम से किसी राष्ट्र, किसी क्षेत्र, और यहाँ तक कि समूचे विश्व के इतिहास को आकार देने की क्षमता रखते हैं। अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले नेहरू का प्रभाव इतना गहरा है और उनकी विरासत का इतना महत्व है कि हम उनके जन्म के 125 वर्षों के बाद और उनकी मृत्यु के 50 वर्ष बाद भी उन्हें स्मरण कर रहे हैं। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के एक निष्ठावान समर्थक, एक क्रान्तिकारी और भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करने वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के आधारस्तम्भ के रूप में नेहरू की भूमिका के बारे में आज यहाँ बहुत सी बातों का उल्लेख किया गया है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में विश्व के सबसे बड़े बहुदलीय लोकतंत्र की नींव रखने और सभी का समावेश करने वाली उदार समावेशी व्यवस्था की स्थापना करते हुए आधुनिक भारत की नींव रखने में भी नेहरू की भूमिका के बारे में भी बहुत सी बातें कही गई हैं।

एक विश्व नेता के रूप में नेहरू की विरासत को हज़ारों मील दूर से देखा और सराहा जाता है क्योंकि वह आज भी दुनिया के लिए प्रासंगिक है।

देवियो और सज्जनो, नेहरू ने नासेर, सुकर्णो, टीटो, निक्रोमा जैसे कद्दावर नेताओं और दूसरे प्रतिष्ठित नेताओं के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की शुरुआत की। ये नेता केवल अपने ही देश के उस औपनिवेशिक अनुभव से प्रेरित नहीं थे जिसने उन्हें अपनी नियति के स्वयं नियंता बनने का संकल्प दिया। ये लोग महात्मा गाँधी के अहिंसावादी आन्दोलन के सिद्धान्त तथा स्वतंत्रता की भावना से निर्देशित थे। साथ ही वे शीतयुद्ध काल के गुटों के राजनैतिक आधिपत्य से प्रभावित अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था और आर्थिक दृष्टि से पाश्चात्य पूँजीवाद और सोवियत साम्यवाद से भी उतने ही दिशानिर्देशित थे।

इन नेताओं ने विकासशील दुनिया के देशों को अपनी सम्प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता, अनाक्रमण और अहस्तक्षेप के सिद्धान्तों का सम्मान करते हुए कार्रवाई करने की अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखना सिखाया। नेहरू ने लोकतंत्र को भी एक सिद्धान्त के रूप में इस सूची में जोड़ दिया। लोकतंत्र जिसे एक व्यवस्था के रूप में गम्भीरता से स्वीकार किया जाए और जो अभाव और पराधीनता से मुक्त एक बेहतर भविष्य के लिए योगदान कर सके। इसके अलावा, ये नेता स्वतंत्रता के लिए लाखों-लाखों लोगों के संघर्ष की ताकत थे और यहाँ नेहरू की भूमिका को रेखांकित करना आवश्यक हो जाता है।

आज अफ्रीका को उपनिवेशवाद से छुटकारा मिल चुका है। इसके लिए वे नेता धन्यवाद के पात्र हैं जो अफ्रीकी देशों की मुक्ति और मानवीय गरिमा की प्राप्ति के संघर्ष में उनके समर्थन में खड़े हुए। निश्चित तौर पर मिस्र उपनिवेशवाद की ताकतों, मानवता के इतिहास के इस अंधेरे युग में उपनिवेशवाद के खिलाफ इस संघर्ष में शामिल हो कर स्वयं को गौरान्वित अनुभव करता है। विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के दायित्व वाले एक वैश्विक संगठन के साथ-साथ अन्तरराष्ट्रीय मानदंडों को निर्धारित करने, अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करने और विकासशील देशों को समान दर्जा देते हुए उनके मत को सुनने वाले मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ के विचार और सिद्धान्तों के भी नेहरू दृढ़ समर्थक थे।

यही नेहरू की विरासत है, उनका वैश्विक नेतृत्व है, और यह केवल गर्व का विषय ही नहीं है बल्कि इसकी प्रासंगिकता का महत्व भी कम नहीं है। एक ओर जहाँ दुनिया इस आन्दोलन के इस महान नेता की 125वीं जयंती मना रही है जिसने शीत युद्ध की समाप्ति का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं हमें शीत युद्ध की मानसिकता की वापसी के संकेतों को लेकर चिन्ता करने भी आवश्यकता है।

अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए वैश्विक शक्तियों के बीच होड़ लगी है और एक बार फिर अन्तरराष्ट्रीय सम्बंधों को शून्य संचय खेल की नीति पर संचालित किया जाने लगा है जहाँ विजेता पूरा लाभ पाने का प्रयास करता है।

किसी भी एक देश या देशों के समूह में वैश्विक नेतृत्व के अभाव के कारण और संयुक्त राष्ट्र संघ की नैतिक शक्ति और उसके साथ बनाई गई व्यवस्था का ह्रास होने के कारण यह चुनौती और भी गम्भीर हो जाती है।

ऐसी स्थिति में हमसे यही अपेक्षा होगी कि इस जयंती समारोह के अवसर पर हम गुट-निरपेक्षता के सिद्धान्त के बारे में पुनर्विचार करें। लेकिन यह चिन्तन एक नए परिप्रेक्ष्य में, एक नए युग में, नई बातों के साथ नई परिस्थितियों में हो, लेकिन फिर भी यह चिन्तन गुट निरपेक्षता के उसी सिद्धान्त पर हो कि हम दुनिया में सत्ता के जोड़तोड़, प्रभाव और सम्भवतः संघर्ष और टकराव को नहीं होने देंगे।

देवियो और सज्जनो, विश्व शांति और सुरक्षा, अन्तरराष्ट्रीय सौहार्द के लिए चनौतियाँ, जोखिम और खतरे वर्तमान समय से अधिक पहले कभी नहीं थे। पूर्वी यूरोप से लेकर अफ्रीका तक, और मध्य पूर्व से लेकर एशिया तक दुनिया आने वाले बड़े उथल-पुथल भरे और अशांत दशकों के मुहाने पर खड़ी दिखाई देती है।

और अन्त में, संघर्ष का बदलता स्वरूप भी चिन्ता का विषय है जहाँ देशों के बीच युद्ध के स्थान पर देशों के भीतर युद्ध, संघर्ष होने लगे हैं, और किस प्रकार धार्मिक और जातीय पैंतरेबाज़ी आतंकवाद का कारण बन रही है। और यहाँ मैं नेहरू के मानवता और विविधता के सिद्धान्तों को स्मरण करना चाहूँगा, हम सभी को धर्म या पंथ या जातीयता के आधार पर भेदभाव के बिना एक साथ मिल कर रहना है। इन सभी चुनौतियों को देखते हुए नेहरू की विरासत की प्रासंकिता और भी बढ़ जाती है। नेहरू के जिन सिद्धान्तों ने शीत युद्ध के चरम में उनकी विदेश नीति की दिशा तय की थी और जिन्होंने विश्व में भारत की भूमिका को परिभाषित किया था, उन सिद्धान्तों का बड़ा सम्मान है। विवादों का अहिंसक ढंग से समाधान, राष्ट्रों की सम्प्रभुता और स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली गैर-हस्तक्षेप की नीति को नई अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्था का मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए और उसे सहयोग, समन्वय और मानवजाति के बेहतर भविष्य की संज्ञा दी जानी चाहिए।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और सहिष्णुता तथा बहुलता के सिद्धान्त पर आधारित समाज के रूप में भारत अपने आपको एक ऐसे आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए, जो सभी मनुष्यों के बीच की समानताओं को महत्व देता है और विविधता तथा असमानताओं को पोषित करता है। विश्व की आर्थिक शक्ति के रूप में भारत एक और प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

मैं एक ऐसे महाद्वीप से आता हूँ जिसने, भारत के नेतृत्व की सहायता से, सफलतापूर्वक उन बाधाओं को पार किया है जो औपनिवेशिक शक्तियों से उसकी स्वतंत्रता और स्वाधीनता के मार्ग को रोके हुए थीं।

मैं ऐक ऐसे क्षेत्र से आता हूँ जो एक बड़ी चुनौती के दौर से गुज़र रहा है, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र जो बदलाव की ओर बढ़ रहा है। बदलाव जिसे मध्य पूर्व के सभी देशों, अरब देशों को प्रेरित करना चाहिए लोकतंत्र के युग की ओर, सफलता के युग की ओर, ऐक ऐसे युग की ओर जहाँ सहयोग हो, तालमेल हो और जहाँ महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रतिष्ठापित सिद्धान्तों का समादर हो। और मैं मिस्र देश से आता हूँ जो गहरे बदलाव के दौर से गुज़र रहा है, भविष्य की ओर अग्रसर, दृढ़तापूर्वक। लोकतंत्र ही हमारा सपना है, लोकतंत्र ही शैली है, लोकतंत्र की भविष्य की राह है और इस दृष्टि से मैं मानता हूँ कि भारत और मिस्र के बीच बहुत अच्छी समझबूझ और तालमेल है।

देवियो और सज्जनो, एक बार फिर भारत आने का निमंत्रण दिया जाना मेरे लिए सचमुच बड़े सम्मान की बात है। मुझे इस देश से प्रेम है, मैं इस देश और यहाँ के नेताओं के ज्ञान का कायल हूँ। इस विरासत का कीर्तिगान विश्व भर में हो रहा है और मिस्र में भी हो रहा है और मिस्रवासी इस विशिष्ट अवसर पर भारत का अभिनन्दन करते हैं।