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सम्मेलन में भाषण

महासचिव, सर्वोदय श्रमदान आन्दोलन, श्रीलंका का भाषण डा. विन्या आर्यरत्ने
महात्मा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा आगे बढ़ाए गए आदर्शों से प्रेरित श्रीलंका के एक जन आन्दोलन के नेता के रूप में मेरे लिए यह एक विशेष सम्मान का विषय है कि मुझे पंडित नेहरू की 125वीं जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम के इस सत्र में “समावेशी लोकतंत्र और लोगों का सशक्तीकरण” विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है।

मैं सर्वोदय श्रमदान आन्दोलन का प्रतिनिधित्व करता हूँ जो कि जनसाधारण के बीच विकास कार्य करने वाला श्रीलंका का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में अपनी स्थापना के बाद से ही सर्वोदय ने प्रतिभागी लोकतंत्र और आत्मनिर्भरता पर आधारित समग्र विकास के मॉडल को बढ़ावा दिया है और लगभग 3 दशकों तक हिंसक आन्तरिक संघर्ष से जूझते उत्तरी और पूर्वी प्रांतों सहित पूरे देश में 15,000 से अधिक ग्रामीण समुदायों तक अपनी पहुँच बनाई है। सर्वोदय की अहिंसा और बहुजातीय समावेश के लिए प्रतिबद्धता के कारण उसे श्रीलंका में रहने वाले सभी समुदायों से सम्मान मिला है।

श्रीलंका में पंडित नेहरू को एक विख्यात और सम्मानित शख्सियत के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1932 में पहली बार श्रीलंका का दौरा किया था। स्कूली छात्र जीवन में हमने पंडित नेहरू के बारे में वह मशहूर किस्सा सुना है जब पंडित नेहरू अपनी यात्रा के दौरान पवित्र शहर अनुराधपुरा में समाधि बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष अकेले गहरे ध्यान की मुद्रा में बैठे रहे थे। 1956 में एक बार फिर पंडित नेहरू ने श्रीलंका की यात्रा की, इस बार वे श्रीलंका में बुद्ध जयंती वर्ष, बुद्ध (543 ई.पू.) के परिनिर्वाण की 2500वीं जयंती के अवसर पर भारत के प्रधामंत्री के रूप में आए थे। श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री नेहरू के साथ आई थीं। उनके प्रवास का मुख्य आकर्षण अनुराधापुरा की उनकी यात्रा थी, जहाँ वे अगले दिन एक विशेष रेलगाड़ी से गए थे। पंडित नेहरू एक बार फिर समाधि बुद्ध की प्रतिमा पर गए और उन्होंने अपनी पिछली यात्रा को याद किया और कहा था कि समाधि बुद्ध की प्रतिमा ने उन्हें कारावास की अवधि में ढाढ़स दिया था।

एक पड़ोसी देश में एक जन आन्दोलन के रूप में हम पंडित नेहरू की विरासत से आज किस प्रकार जुड़े हैं?

जैसाकि आप सभी जानते हैं कि मेरा देश श्रीलंका भी ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन के अधीन था। कई सदियों के राजतंत्र और औपनिवेशिक शासन के बाद श्रीलंका वासियों को 1931 में सर्वव्यापी मताधिकार का अधिकार प्राप्त हुआ, जबकि इससे बहुत पहले दक्षिण-एशिया क्षेत्र के कई देशों में लोगों को यह अधिकार मिल चुका था। हालाँकि इसका दायरा सीमित था, लेकिन इससे श्रीलंका के नागरिकों को शासन चलाने के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार मिलना शुरू हुआ। संविधान में अनेक सुधारों1 के बाद शासन का दायरा बढ़ा और शासन के विभिन्न स्तरों पर चुने हुए प्रतिनिधियों की संख्या भी बढ़ी2। लेकिन इस प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र में “सत्ता” केवल सिंहली और तमिल समुदायों के शीर्ष के कुछ लोगों के हाथ में ही केंद्रित रही है। लेकिन बाद में दोनों ही जातीयताओं के उग्र सुधारवादी युवाओं ने सिंहली और तमिल विशेषाधिकार प्राप्त राजनैतिक नेताओं की आलोचना की क्योंकि वे शासन चलाने की प्रक्रिया में अपने लिए स्थान न होने के कारण निराश थे, शिक्षा की अनुपलब्धता और दूसरी आवश्यक सुविधाओं के न मिलने तथा व्यापक बेरोज़गारी के कारण कुंठित थे। 1971 और 1989 में सिंहली युवाओं के विद्रोह, और 1983 में तमिल युवाओं के विद्रोह, जिनकी बाद में पूर्ण युद्ध के रूप में परिणति हुई, के कारण हज़ारों लोगों की जानें गईं और एक राष्ट्र के तौर पर विकास और समृद्धि के अवसर गँवा दिए गए।

1 डॉनोमोअर संविधान (1931), सोलबरी संविधान (1947), रिपब्लिक संविधान (1972), श्रीलंका के समाजवादी गणतंत्र का संविधान (1978), 1987 में 1978 के संविधान का 13वाँ संशोधन

महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू जैसे महान नेताओं ने जनसामान्य के समुदायों को शासन व्यवस्था में जिस प्रकार सम्मिलित किए जाने की कल्पना की थी, वैसा 1948 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उस पैमाने पर या उस गति से कभी नहीं हुआ। इस दिशा में कुछ विफल प्रयास हुए हैं3, लेकिन दुर्भाग्य से इस समय श्रीलंका एक ऐसी जन केन्द्रित शासन व्यवस्था तैयार करने और उसे लागू करने, जो पारदर्शी और जनता के प्रति, विशेषतया जनसाधारण के प्रति जवाबदेह हो, की दृष्टि से इस क्षेत्र के दूसरे देशों से पिछड़ा हुआ है। कुछ लोगों का तर्क है कि हर साल होने वाले विभिन्न प्रकार के चुनावों में इस प्रकार के अवसर मिलते हैं4, लेकिन देखा गया है कि लोग अपने आप को शासन व्यवस्था में शामिल अनुभव नहीं करते हैं जिसके कारण बहुत थोड़े लोगों की ही मतदान करने में रुचि होती है।

पंडित नेहरू ने विश्व को अनेक सौगातें दी हैं जिनमें एक उत्कृष्ट उदाहरण शामिल है कि किस प्रकार एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में सच्चा लोकतंत्र काम कर सकता है- किस प्रकार अनेकता में एकता स्थापित की जा सकती है, किस प्रकार धार्मिकता से प्रभावित आबादी के बीच एक पंथनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की जा सकती है, किस प्रकार साम्प्रदायिकता की राजनीति से ऊपर उठा जा सकता है आदि।

सर्वोदय के दृष्टिकोण से समावेशी लोकतंत्र पारम्परिक परिभाषा से परे जाता है। इसमें हर उम्र, जातीयता, धार्मिक परम्परा, सामाजिक स्तर वाले लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रता का प्रयोग करने के लिए स्थान, अवसर और मार्ग उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

हम देश भर में जनसामान्य के स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। अभी हमारे यहाँ भारत की तरह “पंचायत” जैसी व्यवस्था नहीं है जहाँ भौगोलिक इकाइयों के रूप में गाँवों को सत्ता का हस्तांतरण किया जाता है। लेकिन हमने मौजूदा कानूनी अधिनियमनों के अन्तर्गत ग्राम स्तर पर विधिक निकायों का सृजन किया है जिन्हें सर्वोदय श्रमदान समिति कहा जाता है। ये स्वतंत्र निकाय जिनकी संख्या 5000 से अधिक है, अपने संविधान के अन्तर्गत कार्य करते हुए गाँव से सम्बंधित कार्यों का संचालन करने के लिए अपने अधिकारियों का चुनाव करते हैं और इन्होंने साबित कर दिया है कि वे प्राचीन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए विभिन्न सामाजिक और आर्थिक कार्यक्रमों की योजना को प्रभावी ढंग से तैयार कर सकते हैं और उन्हें लागू कर सकते हैं। गरीबी से प्रभावित इन समुदायों को जो बाहरी सहायता दी गई है उससे उन्हें आत्मनिर्भर बनने में और अपने कार्यों को सततनीय बनाने में सहायता मिली है और वे वितरित की जाने वाली सहायता राशि पर निर्भर नहीं हैं।

2 संसद (225 सदस्य); प्रान्तीय परिषदें (427 सदस्य); स्थानीय शासन निकाय (~4,000 सदस्य)
3 1871 में ग्राम परिषद अध्यादेश, 1970 के दशक में ज़िला विकास परिषद तथा ग्रामीण विकास समितियाँ
4 राष्ट्रपति के चुनाव; आम चुनाव; प्रांतीय परिषदों के चुनाव; स्थानीय प्राधिकरणों के चुनाव

इसे हम “निचले स्तर से क्रमिक विकास” कहते हैं। जैसाकि प्रो. आदित्य मुखर्जी के शोधपत्र (पृ. 10) में उद्धृत किया गया है, ग्राम स्तर की स्थानीय स्वशासी सहकारी संस्थाओं की भूमिका पर बल देते हुए पंडित नेहरू ने कहा था;

“मुझे अधिकाधिक यह महसूस होता है कि हमें ऊपर से नीचे की ओर कार्य करने के बजाए नीचे से ऊपर की ओर कार्य करना चाहिए। निःसंदेह शीर्ष महत्वपूर्ण है और बहुत हद तक केन्द्रीयकरण भी अपरिहार्य है। लेकिन अत्यधिक केन्द्रीयकरण का मतलब जड़ों के स्तर पर क्षय होगा और अन्ततः शाखाएं और पत्तियाँ और फूल सूख कर मुरझा जाएंगे। इसीलिए हमें गाँवों के स्तर पर इन मूल संस्थाओं को प्रोत्साहित करना होगा।”

इस प्रकार जहाँ हम नीचे के स्तर से लाकतांत्रिक संस्थाओं को विकसित होने में सहायता करते हैं, वहीं सर्वोदय ने भी हमारे देश की जनता की राजनैतिक चेतना में बदलाव लाने और सत्ता तथा संसाधनों के अधिकाधिक सम्भव हस्तांतरण के माध्यम से सहमति पर आधारित राजनीति की संस्कृति विकसित करने के लिए देशोदय के नाम से एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम शुरू किया है। हमारा अन्तिम लक्ष्य ग्राम स्तर पर सर्वोदय श्रमदान समितियों के माध्यम से तैयार की गई मज़बूत नींव पर “ग्राम-स्वराज” की संकल्पना पर आधारित शासन प्रणाली विकसित करना है। देशोदय राज्य के प्राधिकरणों के साथ मिलकर कार्य करते हुए ग्राम समुदायों के भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी को वहन करने के लिए इन समुदायों के बीच समानान्तर नेटवर्क स्थापित करना चाहता है। ये नेटवर्क सुदृढ़ नीति आधारित कार्यक्रमों के इर्द-गिर्द संगठित होकर सरकार के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण और व्यावहारिक पहल करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं। ग्राम समुदायों के बीच राजनैतिक चेतना जगाने और नीति आधारित कार्यक्रमों में योगदान करने के इस देश-व्यापी कार्यक्रम को “देशोदय” नाम दिया गया है।

आज हमारा विश्व विशाल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और पर्यावरण सम्बंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है। साम्प्रदायिक हिंसा और धार्मिक कट्टरतावाद भी चिंताजनक ढंग से बढ़ रहे हैं।

विश्व के जिस भाग में हम रहते हैं वहाँ दल और सत्ता की राजनैतिक व्यवस्थाओं में दो खतरनाक प्रवृत्तियाँ उभर रही हैं। ये हैं साम्प्रदायिक / जातीय और प्रश्रय की राजनीति।

अपनी विविधताओं को अपने संसाधन और ताकत के रूप में देखना एक ऐसा पवित्र लोकतांत्रिक सिद्धान्त है जिसे हमने औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के दशकों बाद तक भी सहेज कर रखा है। पंडित नेहरू पंथनिरपेक्ष राज्य के पक्के समर्थक थे। आज हम अपने राजनैतिक नेताओं को अपनी सत्ता को बनाए रखने या सत्ता प्राप्त करने के लिए धार्मिक, जातीय और अन्य प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक अन्तरों का गलत फायदा उठाते हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि जो समुदाय कई दशकों से सौहार्दपूर्व साथ-साथ रहते आए थे उनके बीच नए तनाव जन्म ले रहे हैं। हमारे यहाँ के कुछ देशों की राजनीति में अब “अस्मिता की राजनीति” हावी हो चुकी है।

दूसरे, जहाँ तक प्रश्रय की राजनीति का सम्बंध है – मुख्यधारा की दलगत राजनीतिक व्यवस्था जनता पर उनकी भोगवादी इच्छाओं की पूर्ति करने वाले भौतिकतावादी उपहारों की बौछार करती रहती है जिसके कारण वे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तर स्तरों पर उनके जीवन को प्रभावित करने वाली समस्याओं से बेखबर हो जाते हैं। दलों की राजनैतिक पैंतरेबाजी ने बड़ी चालाकी से मोहभंग का शिकार हो चुकी जनता को धीरे-धीरे इस हद तक केन्द्र पर निर्भर बना दिया है कि ग्राम स्तर पर पाई जाने वाली आत्म-निर्भरता का निशान तक नष्ट हो गया है। इसलिए समावेशी लोकतंत्र का अर्थ केवल लोगों को जागरूक मतदाताओं के रूप में चुनाव की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सशक्त बनाना ही नहीं है, बल्कि चुनाव से परे ग्राम स्तर पर लोकतांत्रिक संस्कृति का निर्माण और उसका पोषण करना भी है।

मैं प्रो. आदित्य द्वारा उद्धृत किए गए लोकतंत्र के एक दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष का भी उल्लेख करना चाहूँगा जिसे पंडित नेहरू ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया था।

“यदि गरीबी और निम्न स्तर बने रहते हैं, तो फिर कितने ही अच्छी संस्थाएं और कितने ही उच्च आदर्श हों, एक मुक्तिदायी शक्ति के रूप में लोकतंत्र अपना महत्व खो देता है। इसलिए उसका उद्देश्य गरीबी का उन्मूलन करना होना चाहिए... दूसरे शब्दों में, केवल राजनैतिक लोकतंत्र ही काफी नहीं है। उसे आर्थिक लोकतंत्र के रूप में भी विकसित होना चाहिए।”

जनसाधारण के स्तर के जिन सामुदायिक संगठनों का मैंने पहले उल्लेख किया, वे संगठन सूक्ष्म-वित्त, उद्यमिता विकास और ग्रामीण जनता के बीच वित्तीय साक्षरता को बढ़ाने के लिए कार्यक्रमों सहित आर्थिक सशक्तीकरण के विभिन्न कार्यक्रमों के साथ भी जुड़े हैं। यहाँ भी सभी निर्णय ग्राम समिति के निर्वाचित पदाधिकारियों या समितियों द्वारा लिए जाते हैं। ऐसी समेकित और समग्र दृष्टि की मान्यता सम्पत्ति और संसाधनों की सततनीयता और समानता सुनिश्चित करके ही सिद्ध होगी। पंडित नेहरू ने जब “आर्थिक लोकतंत्र” को विकसित किए जाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था तो उनका ऐसा सोचना एकदम सही था।

इस प्रकार पंडित नेहरू के सिद्धान्त और व्यवहार वर्तमान समय में पहले की तुलना में कहीं और अधिक प्रासंगिक हैं। इसलिए हम अपने आप को नेहरू के सिद्धान्तों के आधार पर एक नई विश्व व्यवस्था बनाने के लिए पुनः समर्पित करें और इसकी शुरुआत हमें दक्षिण एशिया से करनी चाहिए।