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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वेश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषणभूटान की महारानी राजमाता दोरजी वांग्मो वांग्चुक
श्रीमती सोनिया गाँधीजी, अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
महामहिम डा. मनमोहन सिंह,
महामहिमगण, विशिष्ट अतिथिगण,
प्रतिभागीगण,

देवियो और सज्जनो!

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल होना मेरे लिए बहुत सम्मान और सौभाग्य का विषय है।

मैं इस महान और शुभ अवसर पर महामहिम नरेश और महामहिम चौथे भूटान नरेश की ओर से ओर से बधाई और शुभकामनाएं देती हूँ।

भूटान के लोगों के मन में प्रधानमंत्री नेहरू का एक विशेष स्थान है। उनकी मित्रता की दो उल्लेखनीय बातों ने हमारे नेताओं और जनता के मन और दिलों को गहराई से प्रभावित किया। उस समय जब हमारा छोटा सा देश आत्मारोपित एकाकीपन की नीति को अपना रहा था, तब इस विशाल और शक्तिशाली पड़ोसी राष्ट्र के उत्कृष्ट नेता ने 1954 में हमारे तीसरे नरेश महामहिम जिग्मे दोरजी वांग्चुक को गणतंत्र दिवस के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करके मित्रता का हाथ बढ़ाया था।

इसके बाद उनकी मित्रता का और भी हार्दिक अनुभव उस समय हुआ जब प्रधानमंत्री नेहरू अपनी बेटी इंदिरा गाँधी के साथ अनेक ऊँचे पहाड़ी दर्रों को पार करते हुए घोड़ों पर सवार होकर एक लम्बी और कठिन यात्रा के बाद 1958 में अपनी ऐतिहासिक यात्रा पर भूटान पहुँचे थे।

अधिकांश लोगों ने इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया कि जब प्रधानमंत्री नेहरू ने हिमालय की श्रृंखला के ऊँचे पर्वतों को पार करते हुए उत्तर में बसे अपने छोटे से पड़ोसी देश की यात्रा की यह दुर्गम यात्रा की उस समय उनकी उम्र 69 वर्ष थी। पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी सरकार के प्रमुख ने पहली बार भूटान की यात्रा करने के लिए प्रयास किया था। मित्रता के लिए अपनी इस उल्लेखनीय यात्रा इस महान व्यक्ति, इस महान नेता ने भूटान की जनता का मन मोह लिया और वे आज भी उन्हें बहुत ‘अगिन्यारोह’ कहकर पुकारते हैं। अगिन्यारोह एक प्रेमसूचक शब्द है जिसका प्रयोग हम परिवार के किसी बेहद सम्मानित बुज़ुर्ग को सम्बोधित करने के लिए करते हैं। ओशन गैलरी महल के मैदान में उन्हें सुनने के लिए आए लोगों को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने भाषण में, जिसका अनुवाद नरेश ने स्वयं किया था, भूटान के सम्बंध में भारत की नीति को स्पष्ट किया था, “कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है कि भारत एक बड़ा और शक्तिशाली देश है और भूटान पर अपना दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि हमारी इच्छा मात्र इतनी है कि आपका देश स्वतंत्र बना रहे और अपनी जीवन पद्धति का स्वयं चुनाव कर सके और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी प्रगति की राह अपना सके। साथ ही हमरे बीच परस्पर सद्भाव बना रहे। हम एक ही हिमालय परिवार के लोग हैं और हमें एक-दूसरे की सहायता करते हुए मित्रवत पड़ोसियों की तरह मिल-जुल कर रहना चाहिए। भूटान और भारत, दोनों ही देशों की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए ताकि कोई भी बाहरी शक्ति हमें नुकसान न पहुँचा सके।“

प्रधानमंत्री नेहरू ने भूटान नरेश को इस बात के लिए प्रेरित किया कि भूटान अपनी आत्मारोपित एकाकीपन की नीति को खत्म करे और विकास की प्रक्रिया को प्रारम्भ करे जिसमें भारत पूरी सहायता करने के लिए इच्छुक है।

प्रधानमंत्री नेहरू का मित्रता और मदद का प्रस्ताव भूटान नरेश को बहुत पसंद आया और 1961 में अपनी पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत करने के साथ ही उसने अपने दरवाज़े बाहर की दुनिया के लिए खोल दिए। इसके साथ ही एक ऐसी प्रक्रिया का सूत्रपात हुआ जिसने भूटान को सामाजिक और आर्थिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ने और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में उभरने में सहायता की। प्रधानमंत्री नेहरू और महामहिम तीसरे नरेश ने मिलकर एक ऐसी मज़बूत नींव रखी जिस पर हमारे दोनों देशों के बीच मित्रता, आपसी समझ-बूझ और सहयोग के रिश्ते इतने वर्षों से फलते-फूलते आए हैं। दोनों देशों के बीच के अनुकरणीय सम्बंधों को प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और भूटान के चौथे महामहिम नरेश ने और फिर उनके बाद के दोनों देशों के नेतृत्व ने, वह चाहे किसी भी दल का रहा हो, इन सम्बंधों को और मज़बूत बनाया। परिणामतः आज भारत-भूटान के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बंध दुनिया में एक छोटे देश और एक बहुत बड़े और शक्तिशाली पड़ोसी देश के बीच के अन्तरराष्ट्रीय सम्बंध का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

भूटान की जनता प्रधानमंत्री नेहरू को हमेशा गहरे सम्मान और प्रेम के भाव के साथ एक ऐसे महान नेता के रूप में याद करेगी जिसने हमारी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाकर एक ऐसी प्रक्रिया को शुरू किया जिसने सब कुछ सम्भव बनाया। भूटान के प्रति प्रधानमंत्री नेहरू की उदार और दूरदर्शी नीति एक नेता और एक राजनेता के रूप में उनकी महानता का केवल एक उदाहरण है। भारत का प्रधानमंत्री बनने से पहले से ही कई देशों के नेता पंडितजी को दूरदृष्टा राजनेता के रूप में सम्मान देते थे। वे एक बड़े विद्वान भी थे, प्रतिभावान लेखक और उत्कृष्ट बुद्धिजीवी थे।

उन्होंने औपनिवेशिक शासन से आजादी के आन्दोलन की दृढ़तापूर्वक वकालत की। गुट-निरपेक्षता आन्दोलन के संस्थापक के रूप में उनके विचारों के नैतिक बल और और उनके महान व्यक्तित्व ने गुट-निरपेक्षता की नीति को बल प्रदान किया और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की हैसियत को भी बढ़ाया। भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पंडित नेहरू को अपने जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के लम्बे संघर्ष के बाद आजाद हुए इतने विशाल और विविधताओं वाले देश का प्रशासन चलाने में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एक बड़ी चुनौती यह थी कि बड़ी सामाजिक समस्याओं और निम्न साक्षरता दर वाले देश में लोकतंत्र को किस प्रकार स्थापित और लागू किया जाए। पश्चिम के कुछ जानकार खुल कर यह घोषणा कर चुके थे कि भारत में लोकतंत्र कामयाब नहीं होगा, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने लौकतांत्रिक सिद्धान्तों के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता से इन आलोचकों को गलत साबित कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि लोकतंत्र की मज़बूती से स्थापित हो जाए। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा संसदीय लोकतंत्र है। भारत को विकसित देश बनाने के लिए उन्होंने कई प्रकार से पहल की, औद्योगीकरण पर बल दिया, विज्ञान और अनुसंधान की नींव रखी और उच्च शिक्षा की उत्कृष्ट संस्थाओं की स्थापना की।

प्रधानमंत्री नेहरू एक महान दूरदर्शी नेता थे और असाधारण योग्यता वाले अन्तरराष्ट्रीय राजनेता तथा बहुमुखी प्रतिभा वाले महान व्यक्ति थे।

वर्तमान वैश्विक चुनौतियों की पृष्ठभूमि में उनकी 125वीं जयंती के अवसर पर दिल्ली में आयोजित किए जा रहे इस सम्मेलन में उनके उनके सिद्धान्तों और उनकी विरासत पर पुनः विचार किया जाना सर्वथा समीचीन है।

मैं आशा करती हूँ कि इस सम्मेलन के परिणाम सफलता देने वाले होंगे।

धन्यवाद।