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सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वेश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषणजनरल ओलुसेगुन ओबासांजो, पूर्व राष्ट्रपति, नाइजीरिया

माननीय सोनिया गाँधी,
अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,

मैं आपकी अनुमति से आधिकारिक सम्बोधन का ही प्रयोग करना चाहूँगा। पिछले दो दिनों से मैंने अनेक वक्ताओं को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व के गुणों और उनकी महानता के बारे में बात करते हुए सुना है।

एक महान नेता को हमें उसकी महानता के अनुरूप सम्मान देना ही चाहिए। हमें उनके महान कार्यों और उनकी कुछ महान उपलब्धियों को देखना होगा जिन्होंने उन्हें इतना महान बना दिया। दूसरे विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद महात्मा गाँधी और अन्य लोगों के साथ नेहरू के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन की तीव्रता बढ़ गई थी। स्वतंत्रता की इस उपलब्धि की कीमत उन्होंने नौ बार जेल जाकर चुकाई। मुझे भी साढ़े तीन वर्ष के लिए कारावास में रखा गया था और आप मेरा यकीन करें यह बहुत कठिन समय था।

वे अपने साथ काम करने वाले सभी लोगों के योगदान को महत्व को स्वीकार करते थे और मैं उनकी स्वतंत्रता प्राप्ति की उपलब्धि को मज़बूत आधार देने वाले व्यक्तिगत गुणों की चर्चा करना चाहता हूँ। उन्होंने उन सभी लोगों को सम्मान दिया जिन्होंने उनके साथ मिलकर काम किया और त्याग किए। उन्हें सम्मान देते हुए उन्होंने कहा:

“महात्मा गाँधी ने अपने लोगों के मन में साहस और पुरुषार्थ जागृत किया और अनुशासन और सहनशीलता और आन्दोलन के लिए खुशी से त्याग करने की भावना जगाई।” अपने आप को कैद किए जाने और अपने दूसरे अनुभवों के बारे में उन्होंने कहा:

“सच्ची खुशी इस बात में है कि हम अपने आप को किसी महान उद्देश्य के साथ जोड़ लें और फिर पूरे मनोयोग के साथ उस काम में लगकर उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने तुच्छ अहम को भुला दें।”

वे अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रखते थे और फिर उसे हासिल करने की कीमत की परावह किए बिना उसे प्राप्त कर लेते थे। आज़ादी मिल जाने के बाद भारत के लिए उनका स्वप्न और उनकी अपेक्षा क्या थी? हमने कल और आज भी इस सम्बंध में चर्चा की है कि उन्होंने भारत में औद्योगीकरण और विकास की प्रक्रिया की नींव रखी। इनमें कृषि, इस्पात उत्पादन, विद्युत, परमाणु और अन्तरिक्ष कार्यक्रम तथा रक्षा के क्षेत्र शामिल थे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने एक बहुधार्मिक वातावरण में एक समतावादी लोकतांत्रिक समाज की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा:

“हम सभी लोग, चाहे हम किसी भी धर्म के क्यों न हों, भारत की सन्तानें हैं और हमारे अधिकार और दायित्व समान हैं।”

वे जनसाधारण के नेता थे और उनकी नब्ज़ पहचानते थे। उनका हर प्रयास भेदभाव, अलगाव, गरीबी, बीमारी और अज्ञान को दूर करने की दिशा में किया गया प्रयास था। उनका कहना था:

“किसी भी जगह गरीबी का होना सभी स्थानों पर समृद्धि के लिए खतरा है। ठीक वैसे ही जैसे किसी एक स्थान पर संक्रामक रोग के होने पर दूसरे स्थानों पर स्वस्थ लोगों के लिए भी खतरा हो सकता है। मैं असंख्य लोगों के सम्पर्क में आया हूँ और चूँकि मैं उनके प्रभाव और विचारों को ग्रहण करता हूँ, इसलिए मैं उन्हें अपने प्रभाव और विचारों को स्वीकार करने के लिए उन्हें राज़ी कर सकता हूँ।” वे शांति और एक नई विश्व व्यवस्था के पक्षधर थे। वे कहते थे:

“शांति केवल तभी स्थापित हो सकती है जब राष्ट्र स्वतंत्र हों और जब सभी स्थानों पर मनुष्यों के लिए शांति हो, सुरक्षा और पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों। इसलिए शांति और स्वतंत्रता के बारे में विचार करते समय हमें उन्हें राजनैतिक और आर्थिक संदर्भ में देखना चाहिए।”

उन्होंने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और उनका यह सिद्धान्त आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था जब उन्होंने इसका प्रतिपादन किया था। भारत की स्वतंत्रता के सबक और उसमें नेहरू की भूमिका से अफ्रीका के नेता जैसे नाइजीरिया के नामदी आज़िकिवे, घाना के तत्कालीन गोल्ड कोस्ट के क्वामे एन्क्रूमाह, तंजानिया जो उस समय तांगायिका था, के जूलियस नियेरेरे, जांबिया के केनेथ कौंडा और दूसरे सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के नेता अनजान या अप्रभावित नहीं थे। फ्रांसीसी उपनिवेशों के राष्ट्रवादी नेता जैसे कोटुवा के बैम्बेला नाइजीरिया, सेनेगल के सेनेगो, माली के मोबिडो कीटा भी ब्रिटिश उपनिवेशों के नेताओं के समान ही उनसे प्रभावित हो रहे थे। औपनिवेशिक अफ्रीका के मुक्ति और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के लिए नेहरू का भारत एक उदाहरण और प्रेरणा का स्रोत था।

नेहरू के वचन और कर्म अफ्रीका के लिए प्रेरणा थे; उन्होंने कहा था, “एशिया या अफ्रीका के संघर्ष में लोग हाँ में हाँ मिलाने वाले चाटुकार बन कर नहीं रहेंगे। हम महान देशों की मित्रता का आदर करते हैं, लेकिन हम उनके साथ समानता के अधिकार के साथ ही बैठ सकते हैं।”

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के दस वर्ष बाद 1957 में एनक्रूमाह के नेतृत्व में गोल्ड कोस्ट स्वतंत्रता पाने वाला सहारा क्षेत्र का पहला अफ्रीकी देश बन गया और फिर एक के बाद एक देश स्वतंत्र होते चले गए। 1950 के दशक के अन्तिम वर्षों में जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के जोसप ब्रोज़ टीटो, मिस्र के गामल अब्दल नासेर, तत्कालीन गोल्ड कोस्ट जो अब घाना है के क्वामे एन्क्रूमाह और इंडोनेशिया के सुकर्णों तथा अन्य नेताओं द्वारा स्थापित किए गए गुट-निरपेक्षता आन्दोलन को अफ्रीका के सभी देशों ने हाथों-हाथ स्वीकार किया और नेहरू तीसरी दुनिया की आवाज़ बन गए। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के बारे में नेहरू ने कहा था:

“गुट-निरपेक्षता का अर्थ मन या कर्म की दृष्टि से निष्क्रिय होना नहीं है, विश्वास या आस्था का अभाव नहीं है। यह तो हमें चुनौती देने वाली समस्याओं के समाधान का एक सकारात्मक और गतिशील दृष्टिकोण है। हम मानते हैं कि हर देश को न केवल स्वतंत्रता का अधिकार है बल्कि अपनी नीति और अपने जीवन की पद्धति तय करने का भी अधिकार है।”

यहाँ भी नेहरू को एक आवश्यकता दिखाई दी और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने समान विचार वाले लोग तलाश किए जिसके परिणामस्वरूप गुट-निरपेक्षता आन्दोलन की शुरुआत हुई और वह आगे बढ़ा।

अब मैं नेहरू के भारत और अपने देश नाइजीरिया के बारे में कुछ बातें कहना चाहूँगा। भारत नाइजीरिया को आधाकारिक तौर पर स्वतंत्रता मिलने से दो साल पहले 1958 में नाइजीरिया में अपना कूटनीतिक मिशन खोलने वाले पहले देशों में से एक था। और भारत ने नाइजीरिया को संयुक्त राष्ट्र में शामिल किए जाने का भी समर्थन किया और राष्ट्रमंडल में भी भारत ने नाइजीरिया को शामिल किए जाने का सहर्ष स्वागत किया। संयुक्त राष्ट्र संघ और राष्ट्रमंडल तथा गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में नाइजीरिया और भारत सदैव परामर्श और सहयोग की भावना से कार्य करते थे जहाँ भारत राष्ट्रमंडल में शामिल सबसे बड़ा देश था और नाइजीरिया राष्ट्रमंडल में सबसे बड़ा अफ्रीकी देश था।

नाइजीरिया की आज़ादी के तीन वर्ष बाद 1962 में और फिर अगले वर्ष 1963 में प्रधानमंत्री नेहरू की नाइजीरिया की राजकीय यात्रा के परिणामस्वरूप भारत को नाइजीरिया की रक्षा अकादमी की स्थापना करने के लिए आमंत्रित किया गया। यह महत्वपूर्ण है कि उस समय राष्ट्रमंडल के बाकी के सदस्यों में से भारत को ही इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए चुना गया था। यह कदम विश्वास और भरोसे का परिचायक था। नाइजीरिया और भारत के बीच इस आपसी विश्वास और भरोसे का लाभ व्यक्तिगत तौर पर मुझे उस समय मिला जब मुझे दक्षिण भारत स्थित वैलिंग्टन, ऊटी में भारतीय रक्षा स्टाफ कॉलेज के लिए नामित किया गया था।

जवाहरलाल नेहरू के जीवन, उनके कृतित्व और उनकी उपलब्धियों से हम क्या सीख सकते हैं? उन्होंने अपने कड़े परिश्रम, प्रतिबद्धता, साहस और दृढ़ संकल्प की बदौलत महानता हासिल की थी। उन्होंने कहा था:

“लानत है ऐसे व्यक्ति पर जो तेज़ नहीं चल सकता, उसके लिए यही ठीक है कि वह गिरे और कतार से बाहर हो जाए। हमें आलसी, कामचोर लोग नहीं चाहिए। मैं काम चाहता हूँ, काम और काम और काम।”

ऐसा व्यक्तित्व था उस नेता का जिसका हम यशगान कर रहे हैं। वे जानते थे कि उन्हें क्या करना है और अपने देश और दुनिया के लिए उसे कैसे हासिल करना है।वे अपने देश और दूसरे देशों के लिए एक वरदान थे। हमें उनकी विरासत को संरक्षित रखना चाहिए और उनका संदेश गूँजता रहना चाहिए।

धन्यवाद।