• होम
  • सम्मेलन में भाषण

सम्मेलन में भाषण

“नेहरू का वेश्विक दृष्टिकोण और उनकी विरासत – लोकतंत्र, समावेश तथा सशक्तीकरण” विषय पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर दिया गया भाषणघाना के राष्ट्रपति, जॉन क्युफुअर

श्रीमती सोनिया गाँधीजी, अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,
महामहिम डा. मनमोहन सिंह, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री
महामहिम महारानी राजमाता, भूटान,
विशिष्ट अतिथिगण,

देवियो और सज्जनो

अमेरिकी सम्पादक नोमेन कैलस ने लिखा है: कि किसी ने नेहरू से पूछा था कि भारत के लिए उनकी विरासत क्या होगी, नेहरू ने जवाब दिया था “चार सौ मिलियन लोग अपने शासन को संभाल सकें।” यह उस व्यक्ति की परिकल्पना थी जब उसने अपनी पार्टी, कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करते हुए इस महान भारत देश के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करने के अपने अभियान की शुरुआत की थी। यह बात दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त हो जाने के दो वर्ष बाद की है। इसने जल्द ही उन्हें दुनिया के महान नेताओं की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया।

स्वतंत्र भारत जल्दी ही ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गया क्योंकि अफ्रीका सहित सभी स्थानों पर औपनिवेशिक क्षेत्रों ने भारत का अनुकरण करने के लिए तैयार हो गए थे। मेरा देश घाना, जो उस समय गोल्ड कोस्ट कहलाता था, भारत की आज़ादी के ठीक दस साल बाद आज़ाद हो गया, यह आजादी 1957 में आई। नेहरू और क्वामे एन्क्रूमाह और घाना के स्वतंत्रता आन्दोलन के नेताओं के बीच की मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि उन्होंने तीन अन्य नेताओं के साथ मिलकर अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन आयोजित किया जो आगे चलकर गुटनिरपेक्षता आन्दोलन बना। इन दोनों नेताओं ने मिलकर दुनिया भर के सभी महाद्वीपों में उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष का समर्थन किया। इसमें संदेह नहीं है कि अफ्रीका के लिए, और विशेष तौर पर उन देशों के लिए जो ब्रिटिश उपनिवेश थे, नेहरू हमारी स्वतंत्रता की आकांक्षाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। बहुत से अफ्रीकी नेहरू के भारत को उस लक्ष्य के उदाहरण के तौर पर देखते थे जो औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए उनके संघर्ष के माध्यम से उनके अपने देशों के लिए राजनैतिक दृष्टि से सम्भव दिखाई देता था। यह मात्र संयोग नहीं था कि मेरे अपने देश घाना में अगस्त 1947 के उसी महीने में जब भारत को आजादी मिली थी, घाना की स्वतंत्रता के संघर्ष का समर्थन करने के लिए तीसरे राजनैतिक दल यूनाइटेड बैकस कन्वेन्शन का गठन हुआ। अफ्रीका के लिए नेहरू के समर्थन और सहानुभूति को उनकी इस उक्ति में बड़े उपयुक्त शब्दों में व्यक्त किया गया है:

“इतिहास को देखने पर मुझे लगता है कि अफ्रीकी महाद्वीप जैसी पीड़ा अन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देती है।”

घाना और भारत के बीच पहली बार मित्रता इन देशों के नेताओं एन्क्रूमाह और नेहरू के बीच की मित्रता के रूप में स्थापित हुई थी। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि जनवरी 2001 से जनवरी 2009 तक जब मैं राष्ट्रपति रहा, भारत ने मेरी सरकार को कई क्षेत्रों में बहुत सहायता प्रदान की। ये सम्बंध अपने चरम पर उस समय पहुँचे जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने अत्याधुनिक राष्ट्रपति प्रासाद के निर्माण के लिए और घाना के लोगों को व्यापक पैमाने पर ग्रामीण विद्युतीकरण की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक मदद की और आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया। इससे पहले राष्ट्रपति आवास राजधानी अक्रा में गुलामों के लिए एक प्राचीन दुर्ग में स्थित था।

भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री, श्री आनन्द शर्मा जो अब कांग्रेस पार्टी के उपनेता हैं, के साथ नए राष्ट्रपति आवास का उद्घाटन करना मेरे लिए एक बड़े सम्मान का अवसर था। राष्ट्रपति के प्रासाद के लिए आसान शर्तों पर ऋण दिए जाने से भी बहुत पहले, हमारे पहले प्रधानमंत्री एन्क्रूमाह ने घाना की राजधानी अक्रा स्थित लाँग एवेन्यू का नाम अपने मित्र नेहरू के नाम पर रखा था। संयोग से यह मार्ग सीधा नए राष्ट्रपति प्रासाद के प्रांगण तक जाता है।

नेहरू एक विख्यात राष्ट्रवादी थे और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए वे नौ वर्ष की कुल अवधि के लिए नौ बार जेल गए। नेहरू के व्यक्तित्व का एक और पहलू यह था कि वे गरीबों और अधिकार वंचितों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने अपने देश भर में और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की व्यापक यात्राएं की थीं जिसके कारण वे अपने लोगों को बहुत अच्छी तरह से समझ सके और उन्हें किसानों की भयावह गरीबी और अभावों को देखने का मौका मिला और वे देश के सामान्य नागरिकों के जीवन की स्थितियों को समझ सके।

उनके व्यक्तित्व का एक और आकर्षक पहलू यह था कि उन्होंने सभी स्थानों पर, और विशेष तौर पर अपने जन्म की भूमि पर मानवतावाद का उत्साहपूर्वक समर्थन किया। अपरिवर्तनशील जातीय और धार्मिक विविधता की चुनौती के बावजूद यही उनकी कुछ नीतियों और सिद्धान्तों का सारतत्व था जिनके लिए वे विख्यात हुए, जैसे शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सशक्तीकरण और पंथनिरपेक्षता और समावेशी शासन व्यवस्था। वे अपने देश को आधुनिकता के पथ पर आगे ले जाना चाहते थे और इस उद्देश्य से उन्होंने वैज्ञानिक नवप्रवर्तन और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। अपने इस मानवतावाद के कारण वे एक सहज लोकतंत्रवादी थे और उन्होंने भारत को लोकतंत्र के मार्ग पर ले जा कर लोकतांत्रिक संस्थाओं, संसदीय बहुदलीय प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रैस को बढ़ावा दिया।

नेहरू केवल अपने देश के लोगों के महान नेता ही नहीं थे; वे विश्व शांति के भी महान समर्थक थे। शांति और सह-अस्तित्व के सिद्धान्तों के प्रति उनका लगाव दुनिया में अद्वितीय है जिसके बारे में उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति है:

“सह-अस्तित्व का एकमात्र विकल्प सह-विनाश है।”

प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू पंचशील – अन्तरराष्ट्रीय सम्बंधों के संचालन के लिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्त – के सह-संस्थापक बने। ये पाँच सिद्धान्त थे: एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और सम्प्रभुता के लिए परस्पर सम्मान, परस्पर अनाक्रमण, परस्पर अहस्तक्षेप, समानता और परस्पर लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

निःसंदेह, नेहरू के दृढ़ विश्वास और संकल्प और यदि मैं कहूँ तो उनके व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण नेहरू के वैश्विक दृष्टिकोण और राष्ट्रों के बीच शांति के सम्बंध में उनकी परिकल्पना जो उनके पंचशील के पाँच सिद्धान्तों में समाहित थी, को अप्रैल 1955 में 29 अफ्रीकी-एशियाई देशों के बांडुंग सम्मेलन में स्वीकार किया गया और बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक प्रस्ताव के रूप में 1961 में पारित किया गया। पंचशील को उसके निर्माताओं ने ऐसे नए स्थापित देशों की आवाज़ के रूप में देखा था जो कठिन परिश्रम से मिली अपनी आजादी को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयासरत थे, क्योंकि यह सिद्धान्त एक ऐसी वैकल्पिक विचारधारा उपलब्ध कराता था जो शीत-युद्ध की चुनौती के बीच शांति और विकास के लिए समर्पित थी।

और ये पाँच सिद्धान्त द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तरों पर अन्तरराष्ट्रीय सम्बंधों का आधार बने। उनके स्वप्न की चरम परिणति नेहरू, क्वामे एन्क्रूमाह, मिस्र के नासर और यूगोस्लाविया के जोसेफ ब्रोज़ टीटो सहित कुछ अन्य नेताओं द्वारा गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना के रूप में हुई। टीटो ने यूगोस्लाविया की राजधानी बैल्ग्रेड में 1961 में इस आन्दोलन के पहले सम्मेलन का आयोजन किया।

यह विरासत है उस महान नेता की जिसे हम आज स्मरण कर रहे हैं – एक ऐसा नेता जिसने अपने देश को औपनिवेशिक सत्ता से स्वतंत्र कराने के लिए अथक परिश्रम किया और उसे ऊँचाई तक पहुँचाया और सच्चे अर्थों में आदर्श लोकतंत्र की नींव रखी। एक बार उन्होंने कहा था:

“विफलता तभी मिलती है जब हम अपने आदर्शों और उद्देश्यों और सिद्धान्तों को भूल जाते हैं।”

नेहरू ने अपने आदर्शों और सिद्धान्तों को कभी नहीं भुलाया और उसका नतीजा यह हुआ कि अपने देश का नेतृत्व करने में उन्हें बड़ी सफलता हासिल हुई।

नेहरू ने भारत को जिस मार्ग पर चलाया था उस पर चलते हुए भारत आज दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसका सकल घरेलू उत्पाद भी उल्लेखनीय है। विश्व बैंक के इन्टरनेशनल कमपेरिज़न प्रोग्राम के एक सर्वेक्षण के अनुसार जो कुछ अर्थव्यवस्थाओं में क्रय शक्ति की समानता पर आधारित है जो वास्तविक जीवन निर्वाह व्यय का अनुमान होती है, भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

आज भारत विश्व की एक परमाणु शक्ति है और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से विश्व का अग्रणी देश है। अपने प्रभावशाली अन्तरिक्ष कार्यक्रम की बदौलत भारत अन्तरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में अमेरिका, रूस, चीन, और यूरोप जैसे देशों के विशिष्ट समूह में शामिल है। निःसंदेह उसका मंगल अभियान सफल रहा है; 24 सितम्बर 2014 को भारत मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने वाला पहला देश बन गया और लाल ग्रह पर पहुँचने वाला पहला एशियाई देश बन गया। कला और संस्कृति के क्षेत्रों में भी भारत अग्रणी है, जिसके लिए बॉलीवुड को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। इससे भी बढ़कर, भारत जिसके नेहरू पहले नेता हुए, अब दुनिया के सबसे टिकाऊ लोकतंत्रों में से एक है।

हम सभी नेहरू का अभिनन्दन करें और उन्हें धन्यवाद दें क्योंकि उनके महान कार्यों और उनके अद्वितीय दृष्टिकोण और परिणामतः उनकी उपलब्धियों के कारण आज एक अरब से अधिक भारतीय अपनी शासन व्यवस्था को संचालित करते हुए दुनिया के सबसे बड़े बहुलतावादी लोकतंत्र में मिल-जुलकर रहते हैं। उनकी इच्छित विरासत कि वे अपने देशवासियों को अपना शासन कुशलतापूर्वक चलाने के योग्य बना सकें निःसंदेह यथार्थ रूप में सिद्ध हो चुकी है।

हम उनके दल कांग्रेस पार्टी और उनके प्यारे देश भारत को शुभकामनाएं देते हैं।

धन्यवाद।