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नेहरू की दूरदर्शिता

जवाहरलाल नेहरू ने भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए अनवरत परिश्रम किया। साथ ही वे भारत की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए भी लगातार चिन्तनशील रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले के समय में अपने लेखन के माध्यम से और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्तावों के माध्यम से भी नेहरू ने देश के सम्मुख स्वतंत्र भारत की नीतियों की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसके अलावा विश्व के इतिहास के उनके अध्ययन और अन्तरराष्ट्रीय विषयों के बारे में उनके ज्ञान ने भारत द्वारा अपने देश के लोगों के समग्र हित के लिए अपनाए जाने योग्य आधारभूत नीतियों के बारे में उनके विचारों को स्पष्टता प्रदान की। 1047 में जब नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उन्हें स्पष्ट तौर पर मालूम था कि भारत को प्रगति हासिल करने के लिए कौन सा मार्ग अपनाना चाहिए।

नेहरू अपने स्वभाव और अभ्यास से लोकतंत्रवादी थे। उनके शुरुआती वर्षों में उनके इंग्लैंड प्रवास के दौरान लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता सम्बंधी उनकी धारणा मज़बूत हुई। यहाँ तक कि स्वतंत्रता आंदोलन, नेहरू जिसका स्वाभाविक हिस्सा बने, भी स्वशासन के सिद्धान्त पर आधारित था। उनके मिजाज़, इंग्लैंड की शिक्षा और ब्रिटिशकालीन भारत में चल रहे राजनैतिक माहौल ने शासन की व्यवस्था और जीवन की पद्धति के रूप में लोकतंत्र में नेहरू की आस्था को दृढ बना दिया। इसलिए नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र का एक मुख्य स्तम्भ के रूप में समावेश होना स्वाभाविक था।

लोकतंत्र में नेहरू की निष्ठा ने विश्व के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी प्रभावित किया था। पिछली शताब्दी के तीसरे और चौथे दशकों में नेहरू ने फासिस्टवाद और नाज़ीवाद के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई थी। उन्होंने 1936 में मुसोलिनी से मिलने से इन्कार कर दिया और उसके कुछ समय बाद जर्मनी आने के लिए हिटलर के आमंत्रण को भी अस्वीकार कर दिया। जर्मनी जाने के बजाए उन्होंने 1936 में स्पेन के गृह युद्ध के दौरान जनरल फ्रांसिस्को फ्रैंको के खिलाफ साहसपूर्वक संघर्ष कर रहे स्पेन के गणतंत्रवादियों का नैतिक समर्थन करने के लिए स्पेन की यात्रा की।

स्पेन के गृह युद्ध के बारे में नेहरू की प्रतिक्रिया ने यह दर्शा दिया कि वे भारत के स्वातंत्र्य संघर्ष को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद क विरूद्ध एक अधिक व्यापक वैश्विक आंदोलन के अभिन्न भाग के रूप में देखते थे। इस दौरान वे दुनिया के विभिन्न भागों की राजनैतिक या आर्थिक समस्याओं को भी, चाहे वे चीन की हों, एब्सिनिया, स्पने, मध्य यूरोप, भारत या दुनिया के किसी भी भाग की रही हों, अलग करके या पृथक रूप में देखने के बजाए एक वैश्विक समस्या के अलग-अलग पहलुओं के रूप में देखने लगे थे।

चूँकि नेहरू राजनीति में अपने प्रवेश के समय से ही लोकतंत्र के पक्षधर रहे थे, इसलिए यह स्वाभाविक था कि स्वतंत्र भारत के लिए वे एक लोकतांत्रिक सरकार का सपना देखते थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए संसदीय लोकतंत्र की परिकल्पना की थी। व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति नेहरू की निष्ठा को लोकतांत्रिक जीवन पद्धति के लिए उनके समर्थन के कारण के रूप में देखा जा सकता है। यूनिटी ऑफ इंडिया में नेहरू ने लिखा है: “नागरिक स्वतंत्रता हमारे लिए कोई अव्यावहारिक सिद्धांत या अप्राप्य अभिलाषा मात्र नहीं है, बल्कि एक ऐसा तत्व है जिसे हम किसी राष्ट्र के व्यवस्थित विकास और प्रगति के लिए आवश्यक मानते हैं। यह किसी ऐसी समस्या के प्रति एक सभ्य नज़रिया है जिसके बारे में लोगों में मतभिन्नता हो, उस समस्या से निपटने का अहिंसक तरीका है।”

नेहरू व्यक्ति की स्वतंत्रता को कितना महत्व देते थे इस बात को नेहरू द्वारा तैयार किए गए मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रम सम्बंधी प्रस्ताव के प्रारूप से माध्यम से समझा जा सकता है जिसे 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन में पारित किया गया था। कराची प्रस्ताव स्पष्ट तौर पर धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की दिशा में भारत का नेतृत्व किए जाने की नेहरू की इच्छा को दर्शाता है। भारत के संविधान की प्रारूप समिति के सदस्यों ने इस प्रस्ताव का संज्ञान लिया था। मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रम सम्बंधी कराची प्रस्ताव के तीन खण्ड, नामतः खण्ड संख्या (ii), (v) और (ix) ध्यान देने योग्य हैं। खण्ड (ix) कहता है: “राज्य सभी धर्मों के प्रति निरपेक्षता का भाव रखेगा।”

नेहरू भारत के आर्थिक विकास को प्रगति की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी मानते थे। उनकी दृष्टि में उपनिवेशवाद के कारण उत्पन्न हुईं भारत की आर्थिक कठिनाइयों का समाधान समाजवाद के माध्यम से किया जा सकता था। इसके अलावा, वे ऐसा मानते थे कि यदि लोकतंत्र को समाजवाद का अवलंब न हो तो लोकतंत्र का सार और महत्व घट जाएगा।

केम्ब्रिज में अध्ययन के दिनों में वे फैबियन समाजवाद, और दूसरी समाजवादी विचारधाराओं के प्रति आकर्षित हुए थे। नेहरू की दृष्टि में समाजवाद केवल एक आर्थिक सिद्धान्त भर नहीं था; वे उसे जीवन पद्धति मानते थे। 1936 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में दिए गए अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने अपने इस दृढ़ मत को व्यक्त किया था कि समाजवाद ही भारत की समस्याओं के समाधान की कुंजी है।
उन्होंने कहा था:
मुझे समाजवाद के अलावा गरीबी, व्यापक बेरोज़गारी, भारत के लोगों की पराधीनता और उनके अपकर्ष से मुक्ति के लिए कोई और मार्ग दिखाई नहीं देता। इसके लिए हमारी राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव करने, भूमि और उद्योग के क्षेत्रों में निहित स्वार्थों को खत्म करने के साथ-साथ भारत की राज्य व्यवस्था में सामंती और अभिजाततंत्रीय व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि निजी सम्पत्ति को, एक सीमित अर्थ में निजी सम्पत्ति को छोड़कर, समाप्त किया जाए, और मौजूदा मुनाफे की व्यवस्था के बदल कर सेवाओं के उच्च आदर्शों वाली व्यवस्था को स्थान दिया जाए।

1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने कहा कि भारत समाजवाद के सिद्धांत को लागू करने के लिए अपने लोगों के स्वभाव के अनुरूप तरीके ईजाद कर सकता है। अपनी इस बात को स्पष्ट करने के लिए नेहरू अक्सर बौद्ध धर्म का उदाहरण दिया करते थे जिसकी शुरुआत भारत में हुई, लेकिन यह धर्म जिस किसी भी देश में गया, उसने अपने आप को उसी देश के अनुरूप ढाल लिया। चीन में उसका चीनी स्वरूप विकसित हो गया। इसी प्रकार उसने बर्मा और जापान में भी अपने आप को उन देशों के अनुकूल बना लिया। इस प्रकार बौद्ध धर्म जिस किसी भी देश में जा कर बसा, उसने अपने आप को उस देश की राष्ट्रीय आत्मा में आरोपित कर लिया।

उनकी यह इच्छा थी कि सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्रदान किया जाए, और कम से कम दिए जाने वाले अवसरों की दृष्टि से कोई असमानता न हो। इसके अलावा वे यह भी चाहते थे कि जितना अधिक सम्भव हो सके, अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटा जाए।

नेहरू व्यावहारिक सूझबूझ वाले नेता थे। उन्हें यह अहसास हो गया था कि भारत की आर्थिक प्रगति के लिए पूँजीवाद के साथ समन्वय की आवश्यकता होगी। नेहरू ने स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही समय बाद कहा था, “मैं इन ‘वादों’ के प्रति आसक्त नहीं हूँ। मेरा दृष्टिकोण यह है, और मैं कहना चाहूँगा कि देश का दृष्टिकोण भी यह होना चाहिए कि किसी समस्या के बारे में शांतचित्त रह कर विचार किया जाए और मैं उससे जुड़े किसी भी ‘वाद’ को भुला देना चाहूँगा। जो भी विधि अपनाई जाए, वह विधि... जो आवश्यक बदलाव लाने में सक्षम हो और जनसामान्य को संतोष प्रदान करने वाली हो तो वह उचित होगी और आशान्वित करने वाली होगी।”

नेहरू मानते थे कि भारत की आर्थिक प्रगति और समृद्धि बड़े पैमाने पर उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने पर निर्भर करती है। केवल गरीबी को खत्म करने के लिए ही ऐसा किया जाना आवश्यक नहीं था, बल्कि निर्णय की प्रक्रिया की स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए भी यह आवश्यक था। नेहरू ने लिखा, “इस विचार को चुनौती देना कठिन है कि आधुनिक विश्व में कोई भी देश बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास किए बिना और अपने ऊर्जा संसाधनों को अधिकतम स्तर तक विकसित किए बिना अन्तरराष्ट्रीय परस्पर निर्भरता की संरचना के दायरे में भी तब तक राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र नहीं हो सकता...।”

नेहरू ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जो उद्योग के साथ-साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से भी उन्नत हो। वे मानते थे कि उद्योग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से भारत की उन्नति न केवल लोगों के आर्थिक स्तर को सुधारेगी बल्कि सामाजिक बदलाव लाने की दृष्टि से भी उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगी।
अनेयरिन बेवन के शब्दों में:
नेहरू भारत में सबसे बड़ा योगदान विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भारी समर्थन दे कर कर रहे हैं। भविष्य में इसके अच्छे परिणाम आर्थिक विकास और सामाजिक बदलाव के रूप में प्राप्त होंगे।

नेहरू मानते थे कि हमें न तो अतीत की अंधभक्ति करनी चाहिए और न ही उसका अनादर करना चाहिए, क्योंकि भविष्य की नींव इनमें से किसी भी दृष्टिकोण पर नहीं रखी जा सकती है।

भारत की स्वाधीनता के संघर्ष के दिनों में भी नेहरू राष्ट्रवाद और अन्तरराष्ट्रीयतावाद के बीच सामंजस्य की बात करते थे। उन्होंने कहा, “हम भारत के लोग विश्व व्यवस्था के साथ सहर्ष सहयोग करेंगे और यहाँ तक कि एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए दूसरे देशों के साथ कुछ हद तक राष्ट्रीय संप्रभुता का त्याग करने के लिए भी सहमत हैं। लेकिन ऐसा करना तभी सम्भव है जब सभी राष्ट्र शांति और स्वतंत्रता के सिद्धान्त के आधार पर एकजुट हों।” नेहरू पूरे विश्वास के साथ यह मानते थे कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता और अन्तरराष्ट्रीयतावाद परस्पर विरोधी नहीं हैं और विश्व व्यवस्था का लक्ष्य “तब तक अप्राप्य सिद्धान्त ही बना रहेगा जब तक कि दुनिया के विभिन्न देश उपनिवेशवाद के शिकार बने रहेंगे क्योंकि आज के युग में शांति और युद्ध की ही भांति उपनिवेशवाद भी अविभाज्य बन चुका है।”

14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को नेहरू ने संविधान सभा में एक संकल्प प्रस्तुत किया जिसमें सभा के सदस्यों से अनुरोध किया गया था कि वे भारत और विश्व की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित करें।
यह संकल्प नेहरू की इस इच्छा की भावपूर्ण गवाही प्रस्तुत करता है। वह संकल्प था:
इस महान अवसर पर, जब भारत के लोगों ने कष्ट सहते हुए और अपने त्याग से स्वतंत्रता हासिल कर ली है, मैं... भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में पूरी विनम्रता के साथ स्वयं को भारत और भारत के लोगों की सेवा के लिए समर्पित करता हूँ ताकि यह प्राचीन देश विश्व समुदाय में अपना उचित स्थान पा सके और विश्व शांति तथा मानव जाति के कल्याण के लिए अपनी पूरी क्षमता से स्वतः प्रवृत्त होकर योगदान कर सके।

1948 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन के प्रस्ताव 5 (नेहरू द्वारा प्रारूपित) में भारत की विदेश नीति के मूलभूत सिद्धान्तों का बहुत स्पष्ट उल्लेख किया गया था। प्रस्ताव के एक महत्वपूर्ण वाक्य में कहा गया था:
भारत की विदेश नीति आवश्यक रूप से उन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए जो विगत वर्षों में कांग्रेस का मार्गदर्शन करते आए हैं। ये सिद्धान्त हैं विश्व शांति को प्रोत्साहन, सभी राष्ट्रों की स्वतंत्रता, जातीय समानता और साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की समाप्ति।

संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए नेहरू का निरन्तर समर्थन उनके वैश्विक दृष्टिकोण का ही परिणाम था। उन्होंने हमेशा संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन किया, हालाँकि कुछ अवसरों पर यह संगठन अपने उद्देश्यों से भटक भी गया था। मार्च, 1948 में उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ को समर्थन और प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है ताकि अन्ततोगत्वा वह एक प्रकार के विश्व शासन या विश्व व्यवस्था के रूप में विकसित हो सके।

अगस्त, 1952 में भी नेहरू ने कुछ इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए। उन्होंने संसद सदस्यों से कहा कि जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यकलाप उसके घोषणापत्र और पिछले वृत्त के विरुद्ध दिखाई दिए हैं, उन्होंने उसकी आलोचना की है। लेकिन नेहरू का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व की एक आधारभूत आवश्यकता है। उनकी इच्छा थी कि भारत कोई ऐसा कदम न उठाए जिससे अन्ततः संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विश्व संगठन के रूप में विकसित होने पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव पड़े।

नेहरू एक विचारक होने के साथ-साथ एक राजनेता भी थे। उनके किसी भी समकालीन नेता ने दुनिया को प्रभावित करने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में इतना चिंतन नहीं किया है। उन्होंने भारत की कल्पना एक ऐसे देश के रूप में की थी जो राजनैतिक दृष्टि से परिपक्व होने के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी उन्नत हो। वे चाहते थे कि भारत के लोग अपने अतीत की सभी उपयोगी बातों को संजो कर रखें और उन्हें वर्तमान की सभी लाभकर बातों के साथ संयोजित करें। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि भारत एक भारत एक लोकतंत्रात्म, पंथनिरपेक्ष और समाजवादी गणराज्य होने के अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता था।

जवाहरलाल नेहरू दृढ़तापूर्वक यह मानते थे कि विभिन्न जातियों और समुदायों सम्बंधी समस्याओं सहित भारत में व्याप्त कई बुराइयों और समस्याओं का समाधान तभी किया जा सकता है जब भारत आर्थिक दृष्टि से मज़बूत हो और वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत हो। अपने भाषणों और लेखों के साथ-साथ देश का नेतृत्व करते समय भी नेहरू ने भारत की भविष्य की दिशा के बारे में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है।